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रणनीति विदेशी मुद्रा

रणनीति विदेशी मुद्रा
Dollar vs Rupee : गिरते रुपये को बचाने के लिए अपनायी जाए यह रणनीति

आर्थिक संकट में घिरे पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार समाप्त होने के कगार पर, दुनिया उसकी ओर से खींच रही हाथ

Pakistan Economic Crisis पाकिस्तान पिछले कुछ समय से भयावह आर्थिक संकट में फंसा हुआ है। उसका विदेशी मुद्रा भंडार समाप्त होने के कगार पर है तो दुनिया उसकी ओर से हाथ खींच रही है। रणनीति दीर्घकाल में अब पाकिस्तान के लिए नुकसानदेह साबित होती दिख रही है।

डा. लक्ष्मी शंकर यादव। पिछले लंबे समय से आर्थिक संकट से जूझ रहे पाकिस्तान में डीजल-पेट्रोल के दाम ऊंचाई के रिकार्ड स्तर पर पहुंच चुके हैं। साथ ही बिजली की कटौती भी बढ़ गई है। पेट्रोलियम उत्पादों पर सब्सिडी खत्म कर दी गई है और गैर जरूरी सामानों के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। नगदी की कमी से संकटग्रस्त पाकिस्तान भारी महंगाई, रुपये की कीमत में गिरावट और कठिन वैश्विक वित्तीय दशाओं से जूझ रहा है।

कर्मचारियों की कमी झेल रहा एयर इंडिया।

ऐसे में दिवालिया होने की कगार पर खड़े पाकिस्तान ने 30 अरब पाकिस्तानी रुपये का अतिरिक्त कर लगाने का निर्णय किया है। तेल और गैस के भुगतान में चूक से बचने के लिए सरकार 100 अरब पाकिस्तानी रुपये जुटाने का प्रयास कर रही है। इस संबंध में उसने आइएमएफ से एक समझौता कर लिया है। इस बीच पाकिस्तान सरकार ने डीजल व पेट्रोल के दाम बढ़ा दिए हैं। बढ़ोतरी के बाद डीजल 245 और पेट्रोल 277 रुपये प्रति लीटर हो गया है। पाकिस्तान की बिगड़ती आर्थिक स्थिति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बीते 11 महीने में देश के कर्ज में 15 प्रतिशत से ज्यादा की वृद्धि हुई है। अमेरिका स्थित एक रेटिंग एजेंसी ने 28 जुलाई को पाकिस्तान की दीर्घकालिक रेटिंग को स्थिर से घटाकर नकारात्मक कर दिया है। इस दिन पाकिस्तानी रुपया अमेरिकी डालर के मुकाबले रिकार्ड निचले स्तर पर जाकर 240 पर बंद हुआ था। अगर स्थिति में सुधार नहीं हुआ तो रणनीति विदेशी मुद्रा आगे हालात और खराब हो जाएंगे।

आइएमएफ से मदद की गुहार

आर्थिक संकट से निपटने के लिए पाकिस्तान के सेना प्रमुख ने अपने देश की खातिर आइएमएफ यानी अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से 1.7 अरब डालर की धनराशि जल्द जारी कराने के लिए अमेरिका से मदद मांगी है। विदित हो कि पाकिस्तान और आइएमएफ ने मूलरूप से वर्ष 2019 में बेलआउट समझौते पर हस्ताक्षर किए थे, लेकिन 1.7 अरब डालर की किस्त पर इस साल के आरंभ में रोक लगा दी गई थी। अब पाक सेना प्रमुख ने अमेरिकी उपविदेशमंत्री वेंडी शरमन के साथ इस मामले पर चर्चा करके पाकिस्तान की मदद के लिए आइएमएफ में अपने प्रभाव का उपयोग करने की अपील की। सेना प्रमुख द्वारा इस तरह की अपील करना विशेष मायने रखता है।

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पाकिस्तान की सेना ने अब तक 75 साल के इतिहास में आधे से अधिक समय तक देश पर शासन किया है और इस दौर में अमेरिका के साथ मिलकर काम किया है। शायद यही पुराना सहयोग काम करवा सके। जबकि हाल के वर्षो में मुख्य रूप से अफगानिस्तान के मामले को लेकर दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ गया था। इमरान खान के कार्यकाल में दोनों देशों के मध्य संबंध तनावपूर्ण रहे।

पाकिस्तान इस रणनीति विदेशी मुद्रा स्थिति से उबरने के लिए चालू वित्त वर्ष में विश्व बैंक, एशियाई विकास बैंक तथा इस्लामी विकास बैंक सहित अन्य बहुपक्षीय लेनदारों से लगभग 10 अरब डालर का कर्ज जुटाने की योजना बना रहा है। वर्तमान में पाकिस्तान की रणनीति विदेशी मुद्रा जो स्थिति बन गई है, ऐसे में आर्थिक संकट से उबरने के लिए वह कुछ भी करने को तैयार है। चीन पाकिस्तान इकोनमिक कारिडोर परियोजना के लिए पाकिस्तान की 7.9 अरब रुपये चीन से मांगने की योजना है। इसके लिए आइएमएफ की अनुशंसा की जरूरत होगी, जबकि वह इसके लिए राजी नहीं है। पाकिस्तान सरकार की तरफ से तीनों सेनाओं के विकास के लिए जारी रकम में से 72 अरब रुपये घटा दिए हैं। यह रकम कुल सैन्य बजट का पांचवा हिस्सा है। आइएमएफ का इरादा पाकिस्तान को चीन से ज्यादा कर्ज लेने से रोक लगाने का है। पाकिस्तान के 3950 अरब रुपये के बजट का 40 प्रतिशत हिस्सा कर्ज पर टिका है जो पिछले वर्ष की तुलना में 29 प्रतिशत ज्यादा है।

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विदेश से उधार लेकर कर्ज तले दबा पाकिस्तान अब कर्ज के लिए अपने कुछ इलाकों और कंपनियों को दांव पर लगाने की तैयारी में है। पाकिस्तान यूएई का दो अरब डालर का कर्जदार बना हुआ है। इस कर्ज की परिपक्वता अवधि भी बीत चुकी है और पाकिस्तान इसकी अदायगी नहीं कर पाया है। यूएई ने इसकी अदायगी की अवधि को मार्च 2022 में एक साल के लिए बढ़ाकर मार्च 2023 कर दिया है। दूसरी तरफ चीन द्वारा दिए गए कर्ज को पाकिस्तान को 27 जून से 23 जुलाई के बीच अदा करना था। पाकिस्तान को दो अरब डालर के कर्ज का भुगतान चीन को करना है। फिलहाल कुछ समय के लिए चीन ने इसे स्थगित कर दिया है जो पाकिस्तान के लिए राहत की बात है। चीन ने इस परिपक्वता धनराशि की अदायगी के लिए अतिरिक्त समय दे दिया है। विदेशी मुद्रा भंडार बचाने एवं नगदी के संकट से जूझ रहे पाकिस्तान को हाल ही में चीन ने एक बार फिर 2.3 अरब डालर का ऋण मुहैया कराया है। इससे पहले भी चीन ने 4.5 अरब डालर का कर्ज दिया था। पाक की अर्थव्यवस्था को बढ़ाने, आजीविका में सुधार और वित्तीय स्थिरता बनाए रखने के लिए चीन पाकिस्तान का समर्थन करता है। परंतु यह रणनीति दीर्घकाल में अब पाकिस्तान के लिए नुकसानदेह साबित होती दिख रही है। चूंकि भारत उसका निकटतम पड़ोसी है, लिहाजा उसे वहां की अर्थव्यवस्था की बदहाली को देखते हुए पहले से ही सतर्क हो जाना चाहिए।

Dollar vs Rupee : गिरते रुपये का आखिर क्या करे सरकार? वेट एंड वॉच की रणनीति से होगा फायदा?

Dollar vs Rupee : महामारी के दौरान एक्सपोर्ट बढ़ा था। लेकिन अब ऐसा रणनीति विदेशी मुद्रा नहीं हो रहा। सितंबर में तो एक्सपोर्ट घट भी गया। यही हाल रहा तो साल 2022-23 में चालू खाते का घाटा जीडीपी के 4 प्रतिशत तक जा सकता है। इससे रुपये में और गिरावट आ सकती है।

Dollar vs Rupee

Dollar vs Rupee : गिरते रुपये को बचाने के लिए अपनायी जाए यह रणनीति

हाइलाइट्स

  • यूएस डॉलर के मुकाबले बीते हफ्ते 83.26 तक चला गया रुपया
  • यूएड फेड के ब्याज दरें बढ़ाने से मजबूत हो रहा डॉलर
  • व्यापार घाटा बढ़ा तो रुपये में और आएगी गिरावट

- अभी दुनिया में 80 फीसदी से ज्यादा व्यापार डॉलर में हो रहा है।

- तमाम देशों के केंद्रीय बैंक जो विदेशी मुद्रा भंडार रखते हैं, उसका करीब 65 प्रतिशत हिस्सा डॉलर में है।

- रुपया इस साल अब तक 10 प्रतिशत से गिरा है तो जापानी येन में 22 प्रतिशत से ज्यादा नरमी आ चुकी है।

- साउथ कोरियन वॉन और ब्रिटिश पौंड 17-17 प्रतिशत गिरे हैं।

- यूरो भी इस साल अब तक 14 प्रतिशत से ज्यादा गिर चुका है।

- चाइनीज रेनमिबी की वैल्यू 12 प्रतिशत घट चुकी है।

क्यों मजबूत हो रहा डॉलर
यूक्रेन युद्ध के चलते पूरा यूरोप बेहाल है। जर्मनी से लेकर फ्रांस, ब्रिटेन और तुर्की तक में महंगाई आसमान छू रही है। दुनिया में एक बार फिर मंदी का खतरा जताया जा रहा है। इकॉनमी से जुड़ा रिस्क जब भी बढ़ता है, निवेशक सुरक्षित माने जाने वाले डॉलर की ओर भागते हैं। एक और फैक्टर है, अमेरिकी फेडरल रिजर्व ब्याज दर बढ़ा रहा है। वह इस साल रणनीति विदेशी मुद्रा मार्च से अपना पॉलिसी रेट 3 प्रतिशत बढ़ा चुका है। इससे विदेशी निवेशक दूसरे इमर्जिंग मार्केट्स और भारत से पैसे निकालने लगे हैं, क्योंकि अमेरिका में उन्हें रिस्क फ्री बेहतर रिटर्न दिख रहा है।

चालू खाता घाटा
रुपये पर दबाव बढ़ने के पीछे एक और फैक्टर है भारत का बढ़ता करंट एकाउंट डेफिसिट। जब निर्यात से होने वाली कमाई के मुकाबले आयात पर ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ता है, तो करंट एकाउंट डेफिसिट की स्थिति बनती है। कोविड महामारी के दौरान भारत से एक्सपोर्ट बढ़ा था। लेकिन अब ऐसा नहीं हो रहा। सितंबर में तो एक्सपोर्ट घट भी गया। अगर यही हाल रहा तो साल 2022-23 में चालू खाते का यह घाटा जीडीपी के 4 प्रतिशत तक भी जा सकता है। यह पिछले 10 वर्षों का सबसे ऊंचा स्तर होगा। क्रूड ऑयल इंपोर्ट के चलते भी चालू खाते का घाटा और बढ़ने का खतरा है। क्रूड ऑयल निर्यात करने वाले देशों ने तय किया है कि वे नवंबर से रणनीति विदेशी मुद्रा उत्पादन 20 लाख बैरल प्रतिदिन घटाएंगे। इससे दाम और चढ़ेगा।

क्या करे भारत?
अब आते हैं इस सवाल पर कि रुपये के मामले में भारत क्या कर सकता है। विकसित देशों में महंगाई चार दशकों के ऊंचे स्तर पर है। वहां मंदी आने का खतरा बढ़ गया है। लिहाजा वहां भारत की वस्तुओं और सेवाओं की डिमांड घटी है। देश में डिमांड बढ़ाकर इसकी भरपाई हो सकती है, लेकिन कुछ हद तक ही। ऐसे में देखते हैं कि भारत सरकार के सामने क्या विकल्प हैं और वे कितने प्रभावी हो सकते हैं।

1. पहला उपाय है देश में चीजों और सेवाओं की डिमांड बढ़ाने के लिए टैक्स घटाया जाए। इससे चीजों और सेवाओं की डिमांड बढ़ेगी, इकॉनमी स्टेबल होगी। लेकिन टैक्स घटने से सरकार के रेवेन्यू पर असर पड़ेगा। वैसे भी आम बजट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2022-23 में राजकोषीय घाटा जीडीपी के 6.4 प्रतिशत के आसपास रहेगा। अभी कर्ज का स्तर भी बहुत बढ़ गया है। सरकारी कर्ज और जीडीपी का रेशियो लगभग 90 प्रतिशत हो चुका है। इन हालात को देखते हुए सरकार के पास राजकोषीय मदद देने की गुंजाइश बहुत कम रह गई है।

2. दूसरा उपाय यह है कि डॉलर की बढ़ती डिमांड का दबाव घटाने के लिए आरबीआई डॉलर बेचे। आरबीआई ने ऐसा किया भी है। लेकिन इससे बात नहीं बनी, उलटे सालभर में विदेशी मुद्रा भंडार करीब 110 अरब डॉलर घट गया। करंट एकाउंट डेफिसिट अगर मामूली होता तो डॉलर बेचने से कुछ मदद मिल सकती थी। लेकिन मामला ऐसा है नहीं।

3. तीसरा उपाय है, अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ रही हैं तो आरबीआई भी ब्याज दरें बढ़ाता जाए। लेकिन दिक्कत यह है कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने ब्याज दर और 125 बेसिस पॉइंट बढ़ाने का संकेत दिया है। भारत में इस तरह के इजाफे की गुंजाइश नहीं है क्योंकि इससे इकॉनमिक रिकवरी को बड़ा झटका लग सकता है।
Rupee Vs Dollar: डॉलर के आगे दुबला होता जा रहा रुपया! गिरावट का बनाया नया रिकॉर्ड, 83 के आंकड़े को किया पार
लोड न ले आरबीआई
ऐसे में ठीक यही लग रहा है कि रुपये को सहारा देने के लिए विदेशी मुद्रा भंडार का इस्तेमाल न किया जाए। आरबीआई रुपये की चाल में तब तक कोई दखल न दे, जब तक कि इसमें अचानक बहुत तेज गिरावट न आए। बाजार के हिसाब से यह जहां तक गिरता है, गिरने दे। इस रणनीति के फायदे भी हैं।

1. एक फायदा तो यही है कि विदेशी मुद्रा भंडार के इतने बड़े इस्तेमाल की जरूरत नहीं रहेगी। फॉरेन एक्सचेंज बचा रहेगा तो अचानक लगने वाले किसी भी बाहरी झटके से इकॉनमी को बचाने में काम आएगा।

2. दूसरी बात, रुपया नरम रहेगा तो भारतीय निर्यात को फायदा मिलेगा।

3. ट्रेड डेफिसिट और करंट एकाउंट डेफिसिट घटाने के लिए आयात घटाने के साथ निर्यात बढ़ाना भी जरूरी है।

4. वैश्विक बाजार में चीन का दबदबा कुछ घटता दिख रहा है। उस जगह को भरने के लिए सरकार को निर्यात पर सब्सिडी देने जैसे कदम उठाने होंगे। लेकिन रुपये में कमजोरी इस मामले में कहीं ज्यादा कारगर साबित हो सकती है।

कुल मिलाकर इस स्ट्रैटेजी में फायदे ज्यादा हैं, नुकसान कम। अच्छी बात यह है कि आरबीआई अब इसी राह पर आ चुका है। ध्यान केवल इतना रखना होगा कि रुपया इतना कमजोर न हो जाए कि इंपोर्ट बिल बहुत ज्यादा बढ़ जाए।

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Dollar vs Rupee : गिरते रुपये का आखिर क्या करे सरकार? वेट एंड वॉच की रणनीति से होगा फायदा?

Dollar vs Rupee : महामारी के दौरान एक्सपोर्ट बढ़ा था। लेकिन अब ऐसा नहीं हो रहा। सितंबर में तो एक्सपोर्ट घट भी गया। यही हाल रहा तो साल 2022-23 में चालू खाते का घाटा जीडीपी के 4 प्रतिशत तक जा सकता है। इससे रुपये में और गिरावट आ सकती है।

Dollar vs Rupee

Dollar vs Rupee : गिरते रुपये को बचाने के लिए अपनायी जाए यह रणनीति

हाइलाइट्स

  • यूएस डॉलर के मुकाबले बीते हफ्ते 83.26 तक चला गया रुपया
  • यूएड फेड के ब्याज दरें बढ़ाने से मजबूत हो रहा डॉलर
  • व्यापार घाटा बढ़ा तो रुपये में और आएगी गिरावट

- अभी दुनिया में 80 फीसदी से ज्यादा व्यापार डॉलर में हो रहा है।

- तमाम देशों के केंद्रीय बैंक जो विदेशी मुद्रा भंडार रखते हैं, उसका करीब 65 प्रतिशत हिस्सा डॉलर में है।

- रुपया इस साल अब तक 10 प्रतिशत से गिरा है तो जापानी येन में 22 प्रतिशत से ज्यादा नरमी आ चुकी है।

- साउथ कोरियन वॉन और ब्रिटिश पौंड 17-17 प्रतिशत गिरे हैं।

- यूरो भी इस साल अब तक 14 प्रतिशत से ज्यादा गिर चुका है।

- चाइनीज रेनमिबी की वैल्यू 12 प्रतिशत घट चुकी है।

क्यों मजबूत हो रहा डॉलर
यूक्रेन युद्ध के चलते पूरा यूरोप बेहाल है। जर्मनी से लेकर फ्रांस, ब्रिटेन और तुर्की तक में महंगाई आसमान छू रही है। दुनिया में एक बार फिर मंदी का खतरा जताया जा रहा है। इकॉनमी से जुड़ा रिस्क जब भी बढ़ता है, निवेशक सुरक्षित माने जाने वाले डॉलर की ओर भागते हैं। एक और फैक्टर है, अमेरिकी फेडरल रिजर्व ब्याज दर बढ़ा रहा है। वह इस साल मार्च से अपना पॉलिसी रेट 3 प्रतिशत बढ़ा चुका है। इससे विदेशी निवेशक दूसरे इमर्जिंग मार्केट्स और भारत से पैसे निकालने लगे हैं, क्योंकि अमेरिका में उन्हें रिस्क फ्री बेहतर रिटर्न दिख रहा है।

चालू खाता घाटा
रुपये पर दबाव बढ़ने के पीछे एक और फैक्टर है भारत का बढ़ता करंट एकाउंट डेफिसिट। जब निर्यात से होने वाली कमाई के मुकाबले आयात पर रणनीति विदेशी मुद्रा ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ता है, तो करंट एकाउंट डेफिसिट की स्थिति बनती है। कोविड महामारी के दौरान भारत से एक्सपोर्ट बढ़ा था। लेकिन अब ऐसा नहीं हो रहा। सितंबर में तो एक्सपोर्ट घट भी गया। अगर यही हाल रहा तो साल 2022-23 में चालू खाते का यह घाटा जीडीपी के 4 प्रतिशत तक भी जा सकता है। यह पिछले 10 वर्षों का सबसे ऊंचा स्तर होगा। क्रूड ऑयल इंपोर्ट के चलते भी चालू खाते का घाटा और बढ़ने का खतरा है। क्रूड ऑयल निर्यात करने वाले देशों ने तय किया है कि वे नवंबर से उत्पादन 20 लाख बैरल प्रतिदिन घटाएंगे। इससे दाम और चढ़ेगा।

क्या करे भारत?
अब आते हैं इस सवाल पर कि रुपये के मामले में भारत क्या कर सकता है। विकसित देशों में महंगाई चार दशकों के ऊंचे स्तर पर है। वहां मंदी आने का खतरा बढ़ गया है। लिहाजा वहां भारत की वस्तुओं और सेवाओं की डिमांड घटी है। देश में डिमांड बढ़ाकर इसकी भरपाई हो सकती है, लेकिन कुछ हद तक ही। ऐसे में देखते हैं कि भारत सरकार के सामने क्या विकल्प हैं और वे कितने प्रभावी हो सकते हैं।

1. पहला उपाय है देश में चीजों और सेवाओं की डिमांड बढ़ाने के लिए टैक्स घटाया जाए। इससे चीजों और सेवाओं की डिमांड बढ़ेगी, इकॉनमी स्टेबल होगी। लेकिन टैक्स घटने से सरकार के रेवेन्यू पर असर पड़ेगा। वैसे भी आम बजट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2022-23 में राजकोषीय घाटा जीडीपी के 6.4 प्रतिशत के आसपास रहेगा। अभी कर्ज का स्तर भी बहुत बढ़ गया है। सरकारी कर्ज और जीडीपी का रेशियो लगभग 90 प्रतिशत हो चुका है। इन हालात को देखते हुए सरकार के पास राजकोषीय मदद देने की गुंजाइश बहुत कम रह गई है।

2. दूसरा उपाय यह है कि डॉलर की बढ़ती डिमांड का दबाव घटाने के लिए आरबीआई डॉलर बेचे। आरबीआई ने ऐसा किया भी है। लेकिन इससे बात नहीं बनी, उलटे सालभर में विदेशी मुद्रा भंडार करीब 110 अरब डॉलर घट गया। करंट एकाउंट डेफिसिट अगर मामूली होता तो डॉलर बेचने से कुछ मदद मिल सकती थी। लेकिन मामला ऐसा है नहीं।

3. तीसरा उपाय है, अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ रही हैं तो आरबीआई भी ब्याज दरें बढ़ाता जाए। लेकिन दिक्कत यह है कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने ब्याज दर और 125 बेसिस पॉइंट बढ़ाने का संकेत दिया है। भारत में इस तरह के इजाफे की गुंजाइश नहीं है क्योंकि इससे इकॉनमिक रिकवरी को बड़ा झटका लग सकता है।
Rupee Vs Dollar: डॉलर के आगे दुबला होता जा रहा रुपया! गिरावट का बनाया नया रिकॉर्ड, 83 के आंकड़े को किया पार
लोड न ले आरबीआई
ऐसे में ठीक यही लग रहा है कि रुपये को सहारा देने के लिए विदेशी मुद्रा भंडार का इस्तेमाल न किया जाए। आरबीआई रुपये की चाल में तब तक कोई दखल न दे, जब तक कि इसमें अचानक बहुत तेज गिरावट न आए। बाजार के हिसाब से यह जहां तक गिरता है, गिरने दे। इस रणनीति के फायदे भी हैं।

1. एक फायदा तो यही है कि विदेशी मुद्रा भंडार के इतने बड़े इस्तेमाल की जरूरत नहीं रहेगी। फॉरेन एक्सचेंज बचा रहेगा तो अचानक लगने वाले किसी भी बाहरी झटके से इकॉनमी को बचाने में काम आएगा।

2. दूसरी बात, रुपया नरम रहेगा तो भारतीय निर्यात को फायदा मिलेगा।

3. ट्रेड डेफिसिट और करंट एकाउंट डेफिसिट घटाने के लिए आयात घटाने के साथ निर्यात बढ़ाना भी जरूरी है।

4. वैश्विक बाजार में चीन का दबदबा कुछ घटता दिख रहा है। उस जगह को भरने के लिए सरकार को निर्यात पर सब्सिडी देने जैसे कदम उठाने होंगे। लेकिन रुपये में कमजोरी इस मामले में कहीं ज्यादा कारगर साबित हो सकती है।

कुल मिलाकर इस स्ट्रैटेजी में फायदे ज्यादा हैं, नुकसान कम। अच्छी बात यह है कि आरबीआई अब इसी राह पर आ चुका है। ध्यान केवल इतना रखना होगा कि रुपया इतना कमजोर न हो जाए कि इंपोर्ट बिल बहुत ज्यादा बढ़ जाए।

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